‘अर्घ्यथाली’ काव्य से दो कवितायें
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९३४)
हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर
(१) नर और मयूर
बैठे थे नरेश्वर
हस्ती के पृष्ठ पर
चित्रमय राजकीय वस्त्रों से सुन्दर
अपना शरीर सुसज्जित कर ॥
रहकर गिरि-शिखर पर
मयूर वही निहार कर
झेल न सका
कृत्रिम बड़प्पन नरेश का ।
अपनी पूँछ पसार
बोला केकानाद से पुकार ।
“ हे नरेश्वर !
तुम नहीं हो मेरे-जैसे
सुन्दर या ऊँचे ।
देखो मुझे,
तुम कितने छोटे हो मुझसे ।
फिर किसलिये अपनेको
ऊँचे मानकर
बड़ा गर्व करते हो ?
मेरी पूँछ के साथ
अगर तुलना करोगे सही,
अपने वेश को, नरनाथ !
तुच्छ समझोगे निश्चित ही ॥
तुम यदि कहोगे भला
‘ज्ञान होता है मनुष्य का,
कहाँ हो सकेगी पक्षी-जाति
मनुष्य की भाँति ?’
मण्डुक के विकट रव के प्रति
ध्यान देती नहीं मेरी श्रुति ।
मेघ का गर्जन सुनकर ऊपर
रहता हूँ मैं नृत्य-तत्पर ॥
झेल नीच जन का दुर्वचन,
उच्च जन की भर्त्सना
हित समझकर अपना,
करते हो क्या उच्च का अर्चन ?
निगलता हूँ भयानक विषधर भुजंग को;
यदि तुम्हारे हृदय में
विनाश की इच्छा जन्मे,
तो क्या विनाश करते हो ?
इन्द्रधनुष के दर्शन से सदा
मेरे मन में खुशी बढ़ जाती ।
क्या दूसरों की सम्पदा
तुम्हारे मन में आनन्द जगाती ?
जो सुख है मेरा पर्वत पर,
भूमि पर भी सुख है वो ।
अटारी में और कुटीर में, हे नरेश्वर !
क्या तुम समान-सुखी रहते हो ?” *
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(२) उसे भी कहते हैं धर्मावतार
पराया धन लुण्ठन करने
मन जिसका व्यस्त निरन्तर,
कुचली जाती जिसकी सम्पत्ति
गणिकागण के चरणों पर ।
जिसका जीवन लाखों लोगों का बोझ अपार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥
जिसकी विद्या धर्मनीति का शीश मरोड़ती,
बुद्धि जिसकी सौ सत्यों को चूर डालती ।
धन से खरिदा जाता जिसका विचार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥
हरण कर स्वर्ण का
जो ताम्र दान करता,
धनों से अपने प्रभु का
सन्तोष जगाता रहता ।
दोषोंको ढँकने अर्पण करता कई उपहार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥
भ्रमण खर्च के लिये
प्राप्त करता है भत्ता,
दरिद्रों के मस्तक मरोड़कर
इधर खाता रहता ।
करता रहता क्षमता का अपव्यवहार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥
घर से खाली हाथ निकलता बाहर,
अपने घर भरता गाड़ी-गाड़ी द्रव्य लाकर ।
बाजार दिखलाता उन द्रव्यों को पुनर्बार,
उसे भी कहते हैं धर्मावतार ॥ *
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संस्कृत-विभागाध्यक्ष,
सरकारी स्वयंशासित महाविद्यालय,
भवानीपाटना-७६६००१ (ओड़िशा)



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