मातृभूमि
मातृभूमि

(अर्घ्यथाली पुस्तक से हिन्दी अनुवाद)

मूल ओड़िआ कविता : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)

 

 *

जब बालक घूमने चलता है

घर पड़ोसियों के,

तब वह जान पाता है

अन्य सारे घर उसके साथियों के ॥

 *

बाद में जब अपने मुहल्ले से

दूसरे मुहल्ले घूमता,

तब पड़ोसियों के मुहल्ले को

वह अपना समझता ।

 **

अपने गाँव से निकलकर 

फिर अन्य गाँव में जब चलता,

तब वह जानता,

वही गाँव है उसका, जहाँ है अपना घर ॥

 ***

अपने गाँव में हैं जो नदी,

तालाब, उद्यान आदि, 

उन सभीको अपना मानकर कहता,

फिर उन सभीको अच्छा समझता ॥ 

 *

बड़ा होकर वह समयानुसार

जब अन्य राज्य में करता विहार,

उधर बखानता रहता

अपने राजा और राज्य के लोगों की श्रेष्ठता ॥ 

**

हाथी घोड़ा से बकरी भेड़ तक सारे

उसके राज्य के अच्छे हैं सभी प्यारे । 

खान है सारे सुखों की

केवल उसका राज्य ही ॥ 

*

फिर बड़ा होकर 

जब चलता कोई कभी देशान्तर,

तब समझता वह देश स्वर्ग से है बड़ा,

जहाँ अपना घर है खड़ा ॥

 *

ज्ञान-बल से जब जान पाता

जगत्पति हैं सबके जन्मदाता,

तभी सहोदर-ज्ञान करता है सही

धरती के मानव-समाज के प्रति वही ॥

*

तब वह जानता है, जो कोई भी

करता है लोगों का उपकार जितना, 

विश्वपति के विश्व-गृह में वही

सन्तान है योग्य उतना ॥

 **

इसी भाँति गाँव की बातें,

राज्य की, देश की और विश्व की बातें

होती हैं प्रतीत मनुष्य-जीवन में,

यह दृश्य होता है सभी रूप में ॥

 

****

मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति

जिसके हृदय में अपनापन जन्मा नहीं,

करेंगे जब ज्ञानियों में उसकी गिनती

तो कहाँ रहेंगे अज्ञानी ? 

 

 

संस्कृत-विभागाध्यक्ष,

सरकारी स्वयंशासित महाविद्यालय,

भवानीपाटना-७६६००१ (ओड़िशा)


टिप्पणियाँ (1)

  • Laxman Ladiwala,Jaipur
    Laxman Ladiwala,Jaipur
    16 February 2012 at 15:39 |

    डा. हरेकृष्ण जी ने यथार्थता से बहुत सुन्दर
    कृति के माध्यम से परिचय करते हुए यह
    भी अवगत कराया है कि मनुष्य को परदेश
    जाने पर अपना सबसे प्यारा गाँव (मात्रभूमि)
    याद आता है | अपनी मात्रभूमि कि सौंधी खुशबु
    में वापस लौट जाने का मन करता है | रचना
    पढने के लिए उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद |
    -लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला,जयपुर

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