सर्द सन्नाटा और कविताएँ
सर्द सन्नाटा और कविताएँ

(1)  सर्द सन्नाटा

सुबह के वक़्त
आँखें बंद कर के देखती हूँ जब
तो यह जिस्म के कोनो से
ससराता हुआ निकल जाता है
सूरज की किरणे चूमती हैं
जब भी इस को
तो खिल उठता है यह
फूल बनकर
और मुस्कुरा देता है
आँखों में मेरी झांक कर

सर्द सन्नाटा

कभी यह जिस्म के कोनो में
ठहर भी जाता है
कभी गीत बन कर
होठों पे रुक भी जाता है
और कभी
गले के सुरों को पकड़
गुनगुनाता है
फिर शाम के
रंगीन अंधेरों में घुल कर
सर्द रातों में गूंजता है अक्सर
सर्द सन्नाटा
मेरे करीब
आ जाता है बहुत
बरसों से मेरा हबीब
सन्नाटा

 

(2) चोरी के कुछ लम्हे 

 
ज़िन्दगी के शोर से कुछ लम्हे चुरा के 
चल पड़ी हूँ उस छोर पे कदम अपने उठा के 
जहाँ सूरज डूबता है 
जहाँ मैं डूबती हूँ  हूँ 
रंगों के इस असीम दरिया में 

रंग अपने ढूँढती  हूँ |



(3) आवर्तन

 

टेढ़े और तिरछे रास्तों
पर चलती लकीरें
नये, पुराने आयामों से निकल
उन्हीं में ढलती
ये लकीरें
परिधि के किसी
कोने में अटक
बिन्दु को अपने तलाशती
भटकती रहीं।
भटकती रहीं।
 
फिर देखा
गोल सा सूरज
टूट चुका था।
ज़हन में भर चुके थे टुकड़े।
चापों में बट चुकी थी
रोशनी चप्पा चप्पा।
वक़्त में जमी और रुकी ये चापें
आज खड़ी हैं रूबरू मेरे
सिर्फ़ पत्थर ही पत्थर
दिखाई देते हैं।
 
आँखें चुभती हैं
जिस्म के हर कोने में।
दबी दबी
थर्राई हुई
इंतज़ार में तो बस
एक ही कि
कब इन चापों में
बँधी रोशनी पिघले?
लावा बनकर
ज़िंदगी के चक्के में
कुछ ऐसी घूमे —
बस घूमती ही
चली जाए।

 
(4) बारिश के खिलोने
 
दौड़ती नज़रें जब
गुज़रे समय की सड़क पर
देखतीं हैं वापस मुड़कर
तो दिखाई देते हैं
दूर छोर पर खड़े
कुछ बारिश के खिलोने
और धूप की नर्मी में भीगे पुराने रिश्ते

और कुछ --
वक्त की धुन्ध में मिटते
पाओं के निशान।



 

टिप्पणियाँ (4)

  • कल्पना रामानी
    कल्पना रामानी
    29 January 2012 at 06:17 |

    भावपूर्ण सुंदर कविताएं।

  • Asha Jasaal
    Asha Jasaal
    29 January 2012 at 12:40 |

    sunder kavitayein..........

  • Dr. Anita Kapoor
    Dr. Anita Kapoor
    03 March 2012 at 09:54 |

    बारिश के खिलौने....वह मीना जी.....बहूत सुंदर कविता व अभिव्यक्ति ...

  • उमेश सिंह, फैजाबाद
    उमेश सिंह, फैजाबाद
    07 अप्रैल 2012 at 11:17 |

    रंगों के इस असीम दरिया में, रंग अपने ढूढंती हूं
    वक्‍त की धुंध में मिटते, पाओं के निशान


    मीना जी, कविता पढ अनुभूति की लहर अंतर्मन में उठी

टिप्पणी रखो

You are commenting as guest.

Cancel Submitting comment...

नव्या विजेट

संपर्क

तकनिकी सहाय